अभिव्यक्ति

कहना तो पडेगा,मशालों में सप्रंदायिकता है।

वेदी से डर किसको,

कुर्बान तो हर वेदना है।

राग अलापें क्या,चिरंजीवी मेरी जिव्हा है

समाज का क्या दोष, कौडी भर मन है।

मैं बोलता तो ठीक हूँ, पढा भी हूँ

मसलन गरीबों का है, बेचता भी हूँ।

जन वार्ता जो बनी, तोडता भी हूँ

मेरी जयकार करो, परस्पर भी हूँ।

तोडुंगा चिल्लाऊंगा-कसमें खाऊंगा

सुबह-शाम चलता हूँ, समय भी हूँ।

अपवाद हलों से, व्याभिचारी भी हूँ

बातों में कटाक्ष,भ्रांति का फैलाव भी हूँ।

लिखना कहाँ ?

माध्यम तो गति करता है,

सुनो आवज संचार की,जय की चेतना है।।

अभिव्यक्ति

मन की भाषा ओझल है,

चुप बैठकर देखुँ सब समतल है

सहज ठहर जाऊँ विरक्त भाव है

आखिर का वाद् जाने कौन है?

मानो पटल पर शून्य है,

भुरी की चुप्पी पर परस्पर मौन है

दर्द की आशा मन से क्या पार है

कलम की बातें जाने कौन है?

मन करता संवाद भी हो,

विवशता भी क्या चार पैरो में भी

यहाँ तो पूरा मन भाव-विहिन है

बातों को समेटने वाला कौन है?

एक तिनके को डर है,

भाव की चपेट में लेखक मौन है

झोकें जो बारिश आने पर मग्न है

चौपालों का हाल जाने कौन है?

अभिव्यक्ति

खेत-मेठ झूठे,राज-काज परदेस का,

गोरू-गाडी छूटे,ओत-प्रोत अमीरी का।

बैठो,

मेढ़ पर भुख खत्म हुई,

लिख-पढ़ कर क्या आयाम बनाऐं,

मेरी मिट्टी दबी है, सुनो!

सजे-मंझे बाजार व्यापार से,

फूट पडे रोशनदानों में,

अबकी हरियाली में खेत कहाँ,पह़र कहाँ?

सुचालक मिट्टी पर धान की टोकरीयां कहाँ?

काठ-पहिया का माली का जोर नहीं,

सुजे हुए स्पर्श हाथों की,

क्रोध-संवाद वाली परस्परता,

किसान-चरवाहों में अब कहाँ?

भंजन बैलों का हुडदंग में चुमान की मार,

हाट-पाल सुस्त अब,

दबे पावों की खोज कहाँ?

अनाज की बोरियों में लिपटी तलब की भार,

लय को खोती,

साख को संवारती कहाँ?

उत्साह ऋतु

आगमन से रोमांचित है,धरा मास की बेला मधुर।

जाग उठी मद बैसाख की,खिल उठे विपुल-विमल।

पपीहीयों की चाल पर,नयन संगिनी मोर।

कोकिला की हास्य पर,काकी के भाव क्रौध।

धान सरसों की वाद-सभा पर,

झुरमुट पताएं फैलाए किरणें।

प्रेमी वसुधा की श्यामल देह पर,

मदमाती धरा शीत का चुंबन।

लोट हुए बगिया की तिनके पौधे-कीटे,

झूला बेली की कांटो ने बांधा सिरमौर।

हरा से भंवराया लिपे-पोते खलिहान,

माधुर्यता की ठाठ पर ठुमके किसान।

फिरती रही बनठ्न तितलीयां,

ऋतु-गमन में पंखियो का चोंच।

जलज नभ माटी की भाव विभोर,

कलियों की मिलन से प्रकृति ‘पंत’।।

गुमटी

काली घटा श्यामल राती, ढक पडा तने चादर

आस की वो शिरोम सवेरा,लेने चला वो अकेला।

बात उसकी सोच अटकी, फिर वो रुबाईयां क्या?

सुत न पाया बदलकर, छटकी उसकी करवटें।

जलती रही वो लाली,चलन जैसी हो धुधंलाती

अदराकर वो बुत सी गई, जगा गई वो अकेला।

बरसकर भी न चाह सका, मादकता रोक पाने

उठा नींद की झुरमुट से, गरियाकर भनकारे को।

बाहर खडा खुंडी खोले,चापनय्न ठहाकों से

रात की सुरमी तंगो,चप्पल तने चल पडा।

एक से तीन भनभनाती, तलब उसकी गीतों मे

बुलावा वो इश्क की हो,चुन्नू की काली पतंग।

चाहे-परचाहे ‘पुरना’, चाय की भुटकी दुकान

पोट से छब्बीस रूपये, दो लोगां एक अजमाने।

आदतों से पार जाकर,रखा धुंए को सुलहाने

चल पडा उसकी वो, चाय की दुकान देखकर।।